Mahua Live Nalanda: भारतीय सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के कालजयी दूत हैं पं. दीनदयाल : डॉ रामकृष्ण परमहंस

राजनैतिक, अर्थिक, संस्कृतिक व सामाजिक संरचना की चतुरंगी भारतीय धरातल उनकी देन : डॉ प्रभास कुमार

संस्कृति में निष्ठा के प्रबल हिमायती थे दीनदयाल: डॉ ध्रुव

दीनदयाल उपाध्याय की जयंती पर नालंदा कॉलेज में ” एकात्म मानववाद ” विषयक संगोष्ठी आयोजित

Mahua Live Nalanda:-पंडित दीनदयाल उपाध्याय उन आधुनिक भारतीय विचारकों में एक थे जिन्होंने अपनी मौलिक और सार्वभौमिक चिंतन से समाज, राष्ट्र और विश्व को एक नवीन और समरस मार्ग प्रशस्त किया।वे एक समावेशित विचारधारा के समर्थक थे तथा एक मजबूत और सशक्त भारत चाहते थे।ये बातें नालंदा कॉलेज के प्राचार्य डॉ रामकृष्ण परमहंस ने शनिवार को शिक्षाशास्त्र ( बी एड) विभाग द्वारा पंडित दीनदयाल उपाध्याय की 106ठी जयंती पर आयोजित ” एकात्म मानववाद विषयक संगोष्ठी का उद्घाटन करने के पश्चात लोगों को संबोधित कर रहे थे।

इस अवसर पर उन्होंने डॉ ध्रुव कुमार की संपादित पुस्तक ” पं. दीनदयाल उपाध्याय का शिक्षा दर्शन ” का लोकार्पण भी किया मुख्य वक्ता दर्शनशास्त्र विभाग के एसो. प्रोफेसर डॉ प्रभास कुमार ने पं. दीनदयाल के एकात्म मानवदर्शन की विस्तार से चर्चा करते हुए कहा कि उन्होंने भारत की सनातन विचारधारा को युगानुकूल रूप में प्रस्तुत करते हुए देश और दुनिया को ” एकात्म मानववाद ” के रूप में एक नई विचारधारा दी। उन्होंने आधुनिक राजनैतिक, अर्थव्यवस्था तथा सामाजिक संरचना के लिए एक चतुरंगी भारतीय धरातल प्रस्तुत किया।संगोष्ठी की अध्यक्षता करते हुए बीएड विभागाध्यक्ष डॉ ध्रुव कुमार ने कहा कि उनके राजनीतिक जीवन दर्शन का सूत्र था – संस्कृति में निष्ठा। यह संस्कृति ही भारतीय राष्ट्रवाद का आधार है और संस्कृति में निष्ठा रहे, तभी भारत एकात्म रहेगा। उनकी इसी नवीन विचारधारा को दुनिया ” एकात्म मानव दर्शन ” या ” एकात्म मानववाद ” के रूप में जानती है।वे अक्सर कहां करते थे – ” हमारी राष्ट्रीयता का आधार भारत माता हैं, केवल भारत नहीं I ” माता ” शब्द हटा देने से भारत केवल जमीन का टुकड़ा मात्र बनकर रह जाएगा । “डॉ राजेश कुमार ने कहा कि वे एक दार्शनिक, अर्थशास्त्री, समाजशास्त्री, इतिहासकार, प्रखर राष्ट्रवादी पत्रकार तथा सर्वकालिक सार्वभौमिक चिंतक विचारक थे ।सुश्री इशिता ने कहा कि वे एक लोक कल्याणकारी राष्ट्र के निर्माण के लिए राजनीतिक शुचिता को परम आवश्यक मानते थे।पिंकी कुमारी ने कहा कि उन्होंने व्यक्तिगत जीवन तथा राजनैतिक दोनों में सिद्धांत और व्यवहार में समानता बनाए रखने पर बल दिया। उनके रोम-रोम में राष्ट्रीयता थी और उनकी राष्ट्रीयता का अर्थ दूसरे विचारकों से भिन्न था।इस अवसर पर संगीता कुमारी, दिलीप कुमार पटेल सहित अन्य शिक्षक मौजूद थे।

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